सबसे पहले, लगातार बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और हिंसक झड़पों के बीच प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। उनके इस्तीफे के बाद अब नेपाल में अंतरिम सरकार बनाने की चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच, देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकीं सुशीला कार्की का नाम अंतरिम प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे मजबूत दावेदार के रूप में सामने आ रहा है।

ओली सरकार पर बढ़ा दबाव

ओली 15 जुलाई 2024 को तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि, उनका कार्यकाल मुश्किल से 14 महीने ही चला। उनके नेतृत्व में सरकार पर भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने जैसे फैसलों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे। नतीजतन, धीरे-धीरे सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ता गया। इसके बाद हालात तब बिगड़े जब राजधानी काठमांडू समेत कई शहरों में प्रदर्शन हिंसक हो गए।

इसके अतिरिक्त, प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पों में करीब 20 छात्रों की मौत हो गई, जिससे माहौल और भड़क गया। संसद भवन और कई नेताओं के आवासों पर हमला हुआ। हालात बेकाबू होते देख पहले गृह मंत्री और फिर कृषि मंत्री ने इस्तीफा दे दिया। अंततः, बढ़ते दबाव के बीच 9 सितंबर 2025 को ओली ने प्रधानमंत्री पद छोड़ने का ऐलान कर दिया।

Gen-Z आंदोलन की भूमिका

ध्यान देने योग्य है कि नेपाल का यह आंदोलन खास इसलिए है क्योंकि इसे Gen-Z युवाओं ने नेतृत्व दिया। वास्तव में, डिजिटल युग में पले-बढ़े इन युवाओं ने सोशल मीडिया को हथियार बनाकर भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद की। परिणामस्वरूप, आंदोलन का पैमाना इतना बड़ा हो गया कि इसे नेपाल का अब तक का सबसे बड़ा छात्र-युवा विद्रोह कहा जा रहा है।

इसी दौरान, एक वर्चुअल बैठक बुलाई गई जिसमें लगभग 5000 युवाओं ने हिस्सा लिया। पांच घंटे चली इस बैठक में विभिन्न विकल्पों पर चर्चा हुई। अंत में, बहुमत ने सुशीला कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त चेहरा माना।

बालेन शाह का समर्थन

काठमांडू के मेयर बालेन शाह का नाम भी अंतरिम प्रधानमंत्री पद के लिए सामने आया था। हालांकि, उन्होंने इस जिम्मेदारी को लेने से साफ इनकार कर दिया। इसके विपरीत, बालेन ने कहा कि अभी देश को ऐसी नेतृत्व क्षमता की जरूरत है जो बिना किसी राजनीतिक दबाव के सिर्फ चुनाव कराने और देश को स्थिरता की ओर ले जाने का काम कर सके।

साथ ही, उन्होंने सुशीला कार्की के नाम का खुलकर समर्थन किया और कहा कि उनके नेतृत्व में देश नए चुनावों की ओर तेजी से बढ़ पाएगा।

सुशीला कार्की का बयान

दूसरी ओर, सुशीला कार्की ने भी साफ कर दिया है कि वह जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हैं। उनका कहना है कि शांति और स्थिरता फिलहाल देश की सबसे बड़ी जरूरत है। इसके अलावा, उन्होंने कहा –
“Gen-Z युवाओं ने मुझ पर भरोसा किया है। मैं चाहती हूं कि उनकी उम्मीदों पर खरी उतरूं। अंतरिम सरकार का मकसद सिर्फ चुनाव कराना और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाना होना चाहिए।”

साथ ही, कार्की ने यह भी जोड़ा कि 20 छात्रों की मौत बेहद दुखद है ,और यह हिंसा नेपाल के लिए एक बड़ी चेतावनी है। वहीं, उन्होंने कहा कि सेना ने हालात संभाल लिए हैं, लेकिन अब राजनीतिक समाधान निकालना बेहद जरूरी है।

ओली का भारत पर आरोप

प्रधानमंत्री पद से इस्तीफे के बाद केपी शर्मा ओली ने सीधे तौर पर किसी का नाम नहीं लिया। लेकिन, उन्होंने भारत पर तख्तापलट का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि –
“राम का जन्म नेपाल में हुआ था और लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा नेपाल का हिस्सा हैं। अगर मैं इन मुद्दों पर पीछे हट जाता तो शायद मुझे और मौके मिलते।”

इस प्रकार, उनके इस बयान को नेपाल की राजनीति में भारत को घेरने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

कौन हैं सुशीला कार्की?

सबसे पहले, सुशीला कार्की का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था और वह सात भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं।

  • उनके पिता चाहते थे कि वह डॉक्टर बनें, लेकिन उन्होंने पढ़ाई के लिए राजनीति शास्त्र चुना।
  • उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से राजनीति शास्त्र में मास्टर्स किया।
  • साल 1979 में उन्होंने वकालत के जरिए अपना करियर शुरू किया।
  • 11 जुलाई 2016 से 6 जून 2017 तक वह नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रहीं।
  • हालांकि, 2017 में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव भी आया था। उन पर कार्यपालिका में हस्तक्षेप और पूर्वाग्रह के आरोप लगे। अंततः, यह मामला ठंडा पड़ गया।

उनके अहम फैसले

अपने कार्यकाल के दौरान कार्की ने कई महत्वपूर्ण और हाई-प्रोफाइल फैसले सुनाए।

  • 2012 में पूर्व सूचना मंत्री जयप्रकाश गुप्ता को भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराया।
  • डीआईजी जयबहादुर चंद की डीजीपी पद पर नियुक्ति को रद्द कर दिया और इसे सरकार की मनमानी करार दिया।

इस वजह से उन्हें एक सख्त और निष्पक्ष न्यायाधीश की पहचान मिली।

Gen-Z आंदोलन से क्या संदेश?

कुल मिलाकर, नेपाल का यह आंदोलन सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं है। बल्कि, यह युवाओं के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव का भी संकेत है। वास्तव में, सोशल मीडिया पर पाबंदी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की कोशिश ने युवाओं को और आक्रोशित किया। यही कारण है कि उन्होंने खुलकर बदलाव की मांग उठाई।

आगे का रास्ता

फिलहाल, सुशीला कार्की का नाम सबसे आगे है। हालांकि, अंतरिम सरकार का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं हुआ है। राजनीतिक दलों के बीच बातचीत जारी है और संभव है कि जल्द ही आधिकारिक तौर पर नए अंतरिम प्रधानमंत्री का ऐलान हो।

यदि कार्की इस पद पर नियुक्त होती हैं, तो वह नेपाल के इतिहास में पहली महिला होंगी जो न्यायपालिका से निकलकर देश की सरकार का नेतृत्व करेंगी।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, नेपाल इन दिनों एक संकट और अवसर दोनों के दौर से गुजर रहा है। एक ओर हिंसा और अशांति ने देश की स्थिति को कमजोर किया है। दूसरी ओर, Gen-Z आंदोलन ने लोकतंत्र और पारदर्शिता की नई उम्मीद जगाई है। अंततः, सुशीला कार्की का नाम इस बदलाव का प्रतीक बनकर उभरा है।

आखिरकार, अगर वह अंतरिम प्रधानमंत्री बनती हैं, तो यह नेपाल की राजनीति के लिए ऐतिहासिक मोड़ साबित होगा।

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