हिमाचल प्रदेश का कुल्लू हर साल दशहरे पर अंतरराष्ट्रीय पहचान पाता है। पूरे देश में जहां दशहरा रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों के दहन के साथ समाप्त होता है, वहीं कुल्लू में उत्सव की शुरुआत होती है। यही वजह है कि कुल्लू दशहरा खास और अनूठा माना जाता है।
कब मनाया जाएगा कुल्लू दशहरा 2025?
इस साल कुल्लू दशहरा 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर 2025 तक धूमधाम से मनाया जाएगा। सात दिनों तक धार्मिक अनुष्ठान, देवताओं की झांकी और लोक नृत्य पूरे माहौल को भक्तिमय बना देंगे।
क्यों अलग है कुल्लू दशहरा?
यहां दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले नहीं जलाए जाते। इसके बजाय उनके मुखौटे और झाड़ियां प्रतीक रूप में जलाई जाती हैं। सातवें दिन ‘लंका दहन’ के साथ अष्टांग बलि दी जाती है। यही परंपरा इस उत्सव को बाकी जगहों से अलग बनाती है।
रघुनाथ जी की मूर्ति और मान्यता
मान्यता है कि अयोध्या से लाई गई रघुनाथ जी की मूर्ति जब कुल्लू पहुंची तो राजा जगत सिंह ने उसका चरणामृत पिया। इससे उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया। इसके बाद राजा ने शैव मत की जगह वैष्णव मत को अपनाया। तभी से कुल्लू में दशहरे का आयोजन शुरू हुआ।
पहले यह उत्सव मणिकर्ण और नग्गर में मनाया गया। बाद में जब रघुनाथ जी की मूर्ति सुल्तानपुर लाई गई तो दशहरा ढालपुर मैदान में स्थायी रूप से होने लगा।
रघुनाथ जी की रथ यात्रा
कुल्लू दशहरे का मुख्य आकर्षण है रथ यात्रा। इसमें रघुनाथ जी की मूर्ति के साथ अयोध्या से आए पुरोहित भी बैठते हैं। रथ को एक स्थान पर स्थापित कर उत्सव की शुरुआत होती है। इस दौरान कुल्लवी नाटी और लालड़ी जैसे लोक नृत्य पूरे वातावरण को जीवंत बना देते हैं।
देवी-देवताओं का आगमन
शुरुआत में इस उत्सव में 365 देवी-देवता शामिल होते थे। आज भी लगभग 250 देवता अपने कारकून और बजंतरियों के साथ आते हैं। उनकी उपस्थिति कुल्लू घाटी को सचमुच देवभूमि बना देती है।
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श्रीराम की प्राचीन मूर्ति
कुल्लू में श्रीराम की वह मूर्ति है जिसे उन्होंने अश्वमेध यज्ञ के लिए स्वयं बनवाया था। विशेषज्ञों के अनुसार यह मूर्ति 17.5 लाख वर्ष पुरानी मानी जाती है। जबकि अयोध्या में श्रीराम की बाल रूप की मूर्ति स्थापित है।
सुरक्षा की जिम्मेदारी
इस मूर्ति और अन्य देवताओं के रथों की सुरक्षा का जिम्मा आज भी राज परिवार पर है। यह परंपरा मुगलों और अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है और आज भी जारी है।
निष्कर्ष
कुल्लू दशहरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम है। यहां पुतले जलाने के बजाय मुखौटों को जलाना इस संदेश को देता है कि बुराई का नाश प्रतीकात्मक ही नहीं, बल्कि आत्मिक स्तर पर भी होना चाहिए।







